जन्माष्टमी का पावन पर्व हर साल भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह दिन केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि ज्योतिषीय और खगोलीय दृष्टि से भी बेहद खास माना जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भगवान कृष्ण का जन्म एक अत्यंत शुभ और दुर्लभ ग्रह-नक्षत्रों के संयोग में हुआ था, और हर साल जन्माष्टमी पर उन्हीं विशेष स्थितियों को याद किया जाता है।
भगवान श्री कृष्ण की जन्म कुंडली: एक दिव्य संयोग
पौराणिक मान्यताओं और ज्योतिषीय गणनाओं के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को, रोहिणी नक्षत्र में और वृषभ लग्न में मध्यरात्रि को हुआ था। उनकी जन्म कुंडली में ग्रहों की स्थिति कुछ इस प्रकार थी:
- चंद्रमा (Moon): अपनी उच्च राशि वृषभ में लग्न (पहले भाव) में विराजमान थे। चंद्रमा कृष्ण के चंद्रवंशी होने और उनके मनमोहक व्यक्तित्व को दर्शाता है।
- सूर्य (Sun): अपनी स्वराशि सिंह में चौथे भाव में थे, जो उनके पराक्रम और राजसी गुणों को दर्शाता है।
- मंगल (Mars): अपनी उच्च राशि मकर में नवम भाव में थे, जो उन्हें शक्तिशाली और धर्म की रक्षा करने वाला बनाता है।
- बुध (Mercury): अपनी स्वराशि कन्या में पंचम भाव में थे, जो उनकी अद्भुत बुद्धि और कूटनीतिक क्षमता को दर्शाता है।
- बृहस्पति (Jupiter): अपनी उच्च राशि कर्क में थे (कुछ मान्यताओं के अनुसार), जो उनके ज्ञान और गुरुत्व को दर्शाता है।
- शुक्र (Venus): अपनी स्वराशि तुला में छठे भाव में थे, जो उनके सौंदर्य और कला प्रेम को दर्शाता है।
- शनि (Saturn): अपनी स्वराशि कुंभ में सप्तम भाव में थे, जो उन्हें न्यायप्रिय और कर्मयोगी बनाता है।
- राहु और केतु (Rahu & Ketu): राहु सप्तम भाव में और केतु लग्न में चंद्रमा के साथ थे, जो उनके असाधारण जीवन और लीलाओं की ओर इशारा करता है।
यह ग्रहों का ऐसा दुर्लभ और शक्तिशाली संयोग था, जिसने भगवान कृष्ण को 16 कलाओं से परिपूर्ण और स्वयं परमेश्वर के रूप में प्रकट किया।
जन्माष्टमी पर ग्रहों का विशेष संयोग
हर साल जन्माष्टमी पर, खगोलविद और ज्योतिषी यह देखते हैं कि क्या भगवान कृष्ण के जन्म के समय बने ग्रह-नक्षत्रों के संयोग इस दिन भी बन रहे हैं। कई बार, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र का एक साथ आना ही इस दिन को अत्यंत शुभ बना देता है। जब इसके साथ बुधवार का दिन भी जुड़ जाता है, तो इसे जयंती योग कहा जाता है, जिसे बेहद पवित्र और फलदायी माना जाता है।
इसके अलावा, कुछ वर्षों में गजकेसरी योग (जब चंद्रमा और बृहस्पति एक साथ या एक-दूसरे से केंद्र में होते हैं) जैसे अन्य शुभ योग भी जन्माष्टमी पर बनते हैं, जिससे इस दिन की शुभता और बढ़ जाती है। इन योगों में की गई पूजा-अर्चना और धार्मिक कार्य कई गुना अधिक फल देते हैं।
ज्योतिषीय महत्व और लाभ
जन्माष्टमी पर बनने वाले ये विशेष ग्रह संयोग भक्तों के लिए कई तरह से लाभकारी होते हैं:
- मनोकामना पूर्ति: माना जाता है कि इन शुभ योगों में भगवान कृष्ण की पूजा करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
- ग्रह दोषों से मुक्ति: जो लोग अपनी कुंडली में किसी ग्रह दोष से पीड़ित हैं, वे इस दिन विशेष पूजा करके उन दोषों को कम कर सकते हैं। विशेष रूप से चंद्रमा से संबंधित दोषों के लिए यह दिन बहुत शुभ होता है।
- आध्यात्मिक उन्नति: यह दिन आध्यात्मिक साधना और ध्यान के लिए उत्तम होता है, क्योंकि ब्रह्मांड में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।
- सुख-समृद्धि: इन शुभ योगों में पूजा करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है।
संक्षेप में, जन्माष्टमी का पर्व भगवान श्री कृष्ण के दिव्य जन्म का उत्सव होने के साथ-साथ, ग्रहों की विशेष स्थिति के कारण एक अत्यंत शक्तिशाली और शुभ दिन भी है। यह हमें न केवल भगवान के जीवन से प्रेरणा लेने का अवसर देता है, बल्कि ज्योतिषीय दृष्टि से भी हमारे जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने में मदद करता है।
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