रक्षाबंधन 2025
रक्षाबंधन क्यों मनातें है? फोटो - Pinterest

रक्षाबंधन का पावन पर्व 2025 : इसकी शुरुआत, इतिहास और भाई-बहन के रिश्ते में इसका महत्व

रक्षाबंधन, भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का प्रतीक, भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण त्योहार है। हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह पर्व, सिर्फ एक धागा बांधने से कहीं बढ़कर है। यह सुरक्षा, स्नेह और एक-दूसरे के प्रति समर्पण का प्रतीक है। आइए, 2025 में इस त्योहार को मनाने से पहले इसके इतिहास और हाथों में राखी बांधने की प्रथा की शुरुआत को विस्तार से जानें।

रक्षाबंधन कब मनाया जाता है?

रक्षाबंधन का त्योहार हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार, यह आमतौर पर अगस्त के महीने में पड़ता है। 2025 में, रक्षाबंधन का पावन पर्व 9 अगस्त, शनिवार को मनाया जाएगा। इस दिन बहनें अपने भाइयों की कलाई पर रक्षासूत्र या राखी बांधती हैं और उनके लंबे व सुखी जीवन की कामना करती हैं, जबकि भाई अपनी बहनों की रक्षा का वचन देते हैं।

राखी बांधने की प्रथा की शुरुआत: विभिन्न पौराणिक कथाएं

हाथों में रक्षासूत्र बांधने की प्रथा बहुत पुरानी है और इसका संबंध कई पौराणिक कथाओं से है। यह केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह सुरक्षा और शुभता के लिए किसी को भी बांधा जा सकता था।

1. इंद्र और इंद्राणी की कथा

भविष्य पुराण में एक कथा मिलती है कि एक बार देवराज इंद्र और दानवों के बीच भयंकर युद्ध हुआ, जिसमें देवता हारने लगे। तब देवराज इंद्र की पत्नी शची (इंद्राणी) ने गुरु बृहस्पति के कहने पर एक रक्षासूत्र को मंत्रों से पवित्र कर इंद्र की कलाई पर बांधा। इस रक्षासूत्र के प्रभाव से इंद्र विजयी हुए। माना जाता है कि यहीं से युद्ध में पति की जीत के लिए पत्नियों द्वारा रक्षासूत्र बांधने की परंपरा शुरू हुई।

2. राजा बलि और देवी लक्ष्मी की कथा

एक अन्य प्रचलित कथा राजा बलि और देवी लक्ष्मी से संबंधित है। जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि मांगी और उन्हें पाताल लोक भेज दिया, तो राजा बलि ने भगवान विष्णु से हमेशा अपने सामने रहने का वचन ले लिया। इससे देवी लक्ष्मी चिंतित हो गईं। नारद मुनि की सलाह पर, देवी लक्ष्मी राजा बलि के पास गईं और उन्हें अपना भाई बनाकर उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा। बदले में उन्होंने राजा बलि से भगवान विष्णु को अपने साथ वैकुंठ ले जाने का वरदान मांगा। यह घटना भी श्रावण पूर्णिमा के दिन हुई थी।

3. कृष्ण और द्रौपदी की कथा

महाभारत काल में एक बार भगवान कृष्ण की उंगली में चोट लग गई थी और उसमें से रक्त बहने लगा था। तब द्रौपदी ने तुरंत अपनी साड़ी का पल्लू फाड़कर कृष्ण की उंगली पर बांध दिया। इस कार्य से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने द्रौपदी को हर संकट में रक्षा का वचन दिया। जब दुशासन ने द्रौपदी का चीरहरण करने का प्रयास किया, तब भगवान कृष्ण ने उनके वस्त्र बढ़ाकर उनकी लाज बचाई। इस घटना को भी रक्षासूत्र के महत्व और भाई-बहन के अटूट रिश्ते की नींव माना जाता है।

यह त्योहार भाई-बहन के त्योहार में कैसे बदला?

उपरोक्त कथाओं से स्पष्ट है कि शुरुआत में रक्षासूत्र किसी भी व्यक्ति को सुरक्षा या शुभता के लिए बांधा जाता था, चाहे वह पति-पत्नी हों, राजा-प्रजा हों या गुरु-शिष्य। लेकिन धीरे-धीरे, यह त्योहार भाई-बहन के पवित्र रिश्ते से जुड़ गया। इसके पीछे कई कारण और ऐतिहासिक संदर्भ हो सकते हैं:

  • पौराणिक कथाओं का प्रभाव: कृष्ण-द्रौपदी की कथा ने भाई द्वारा बहन की रक्षा के वचन को एक मजबूत आधार दिया।
  • सामाजिक विकास: जैसे-जैसे समाज में परिवार और रिश्तों का महत्व बढ़ा, भाई-बहन के स्नेह और एक-दूसरे के प्रति कर्तव्य को व्यक्त करने के लिए यह त्योहार एक महत्वपूर्ण माध्यम बन गया।
  • ऐतिहासिक उदाहरण: मध्यकालीन भारत में, चित्तौड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजकर उनसे सहायता मांगी थी। हुमायूं ने राखी का मान रखते हुए उनकी रक्षा की, जिससे यह त्योहार विभिन्न धर्मों और समुदायों के बीच भी भाईचारे का प्रतीक बन गया।

इन सभी कारणों से, रक्षाबंधन का त्योहार समय के साथ विकसित होता गया और आज यह मुख्य रूप से भाई-बहन के प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे की रक्षा के संकल्प का प्रतीक बन गया है। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि रिश्ते सिर्फ खून के नहीं होते, बल्कि प्रेम और समर्पण के धागों से भी बंधे होते हैं।

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