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आत्मा का वजन कितना होता है? जानिए 21 ग्राम वाले सबसे रहस्यमयी एक्सपेरिमेंट के बारे में

21 ग्राम Experiment

विज्ञान ने बहुत सारे experiment किए है, लेकिन कुछ ऐसे Experiment भी है, जिसने पूरी दुनिया को हिला के रख दिया था। जिसमें एक था 21 ग्राम एक्सपेरिमेंट, हम ऐसे 3 और एक्सपेरिमेंट को जाएंगे जिससे पूरी मानव सभ्यता आज भी हैरान है, जिन्होंने  प्रकृति के ख़िलाफ़ जाकर यह खतरनाक प्रयोग किया।

1. 21 ग्राम एक्सपेरिमेंट – क्या आत्मा का कोई वज़न होता है?

इसी सवाल ने 20वीं सदी की शुरुआत में एक अमेरिकी डॉक्टर डंकन मैकडूगल को विचलित कर दिया।

साल था 1907, डॉ. मैकडूगल Dr. McDougall ने एक अलग सोच के साथ यह मान लिया कि अगर आत्मा वास्तव में मौजूद है, तो उसका कोई ना कोई भौतिक प्रभाव ज़रूर होगा – यानी वज़न। उन्होंने ऐसे 6 मरीजों का चयन किया जो गंभीर रूप से बीमार थे और जल्द ही मृत्यु के कगार पर थे।

कैसे किया गया प्रयोग?

हर मरीज के नीचे एक अत्यधिक संवेदनशील तराजू (spring balance) लगाया गया।जैसे ही मरीज ने अंतिम सांस ली, उन्होंने शरीर का वज़न नोट किया।परिणाम चौंकाने वाले थे –हर मरीज के मरने के कुछ ही सेकंड बाद, शरीर का वज़न औसतन 21 ग्राम कम हो गया।

डॉ. मैकडूगल का दावा: “यह घटा हुआ वज़न ही आत्मा का है, जो मृत्यु के साथ शरीर से बाहर चली जाती है।”

विवाद और सवाल: यह प्रयोग केवल 6 लोगों पर किया गया – यानी वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद सीमित। कुछ वैज्ञानिकों का मानना था कि मृत्यु के बाद शरीर से गैस, पसीना या श्वसन के रुकने से यह वज़न घटा होगा। लेकिन… इस प्रयोग ने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया — क्या आत्मा सच में होती है? और उसका कोई वज़न भी है? आज भी यह क्यों मशहूर है?

यह प्रयोग आज भी फिल्मों, किताबों और वेब सीरीज़ में जिक्र होता है।”21 ग्राम” का आइडिया इतना गहरा है कि कई लोग इसे आत्मा की पहचान मानते हैं

“क्या मौत के बाद कुछ ऐसा होता है जो शरीर से बाहर चला जाता है?

2. MK-Ultra प्रोजेक्ट – दिमाग से खेलने वाला रहस्यमय खेल

अगर आप सोचते हैं कि खुफिया एजेंसियां सिर्फ जासूसी करती हैं, तो MK-Ultra आपको चौंका देगा। क्या था MK-Ultra?CIA (Central Intelligence Agency) ने 1950 के दशक में एक गुप्त प्रोजेक्ट शुरू किया, जिसका मकसद था — दिमाग को कंट्रोल करना। दुश्मन से जबरन सच उगलवाना ‘सुपर-सोल्जर’ बनाना क्या किया गया?बिना बताए कैदियों, मरीजों और आम नागरिकों को मानसिक दवाएं दी गईं। सबसे ज़्यादा इस्तेमाल हुआ ड्रग LSD (Lysergic acid diethylamide) का, जिससे व्यक्ति की सोच, याददाश्त और होश प्रभावित होता है।लोगों को हिप्नोटिज्म, शॉक थेरेपी, और मानसिक यातनाएं दी गईं।

इसके परिणाम: कई लोग पागल हो गए, कुछ की मौत हो गई कई वर्षों तक लोगों को नहीं पता चला कि उन पर प्रयोग हुआ है,कब और कैसे खुलासा हुआ?

1975 में अमेरिकी सरकार ने खुद इस पर जांच बैठाई।जब दस्तावेज़ सामने आए, तो दुनिया को पता चला कि विज्ञान का उपयोग कैसे एक अंधेरी दिशा में हो सकता है।

3. Russian Sleep Experiment –

अगर इंसान को 15 दिन तक बिना सोए रखा जाए, तो वह क्या इंसान ही रहेगा?”

यही सवाल बना था इतिहास के सबसे डरावने और विवादित वैज्ञानिक प्रयोग का कारण – The Russian Sleep Experiment

यह था प्रयोग का दावा: 1940 के दशक में सोवियत वैज्ञानिकों ने दावा किया कि उन्होंने एक “स्लीप-इनहिबिटर गैस” (नींद रोकने वाली गैस) बनाई है, जिससे इंसान बिना सोए कई दिनों तक जीवित रह सकता है। इसका उद्देश्य था – जंग में इस्तेमाल होने वाले सैनिकों को ज्यादा समय तक एक्टिव रखना। किस पर किया गया प्रयोग? चुने गए 5 राजनीतिक कैदीवादा किया गया कि अगर वे 15 दिन तक बिना सोए रहेंगे तो उन्हें मुक्ति दी जाएगी। उन्हें एक सील कमरे में बंद किया गया और वहां लगातार गैस छोड़ी जाती रही, क्या हुआ आगे?

शुरुआती 3–4 दिन तक सब सामान्य था, लेकिन जैसे जैसे समय और दिन बीतते गए, 5वे दिन में ही उनकी मानसिक अस्थिरता शुरू – वो बड़बड़ाने लगे, पुरानी बातें दोहराने लगे। 6-7 दिन तक कुछ ने खुद को घायल किया,एक कैदी ने चिल्लाना शुरू किया और तब तक चिल्लाया जब तक आवाज चली नहीं गई। दिन 9-10 सभी ने कपड़े फाड़ दिए, खाने को छूना बंद कर दिया। और कमरे की दीवारों पर खून से कुछ लिखना शुरू किया 15वें दिन जब कमरे को खोला गया, तो…कुछ कैदी मर चुके थे। बाकी बचे इंसान जैसे दिखते नहीं थे – वो मुस्कुरा रहे थे, पर उनकी आंखों में मौत थी,सच्चाई या कहानी? यह पूरी घटना एक इंटरनेट creepypasta (डरावनी कहानी) मानी जाती है।

कोई आधिकारिक प्रमाण नहीं है कि ऐसा असली में हुआ हो।लेकिन इसकी कहानी इतनी डरावनी है कि आज भी YouTube, Reddit और Web Series में इसका ज़िक्र किया जाता है।

निष्कर्ष:

यह सभी एक ही बात साबित करते हैं – विज्ञान जब सीमाएं लांघता है, तो इंसानियत कांप उठती है।

 

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